उत्तर प्रदेश ने निर्णय लिया है कि प्रदेश में समूह 'ख' और 'ग' के कर्मचारियों को पहले पांच वर्ष के लिए संविदा के तौर पर नियुक्त किया जाएगा। पांच साल तक हर छठे माह मूल्यांकन होगा और वर्ष के अंत में छठनी होगी जिसमें 60 प्रतिशत से अधिक अंक वालों को ही आगे नौकरी का मौका मिलेगा।

हर फैसले की तरह इसके भी दो पहलू है-

1. अब प्रदेश में अच्छे और योग्य कर्मचारियों की नियुक्ति होगी। नौकरी से पहले ही कार्य का अनुभव हो जाएगा। एक तरह से देखा जाए तो यह पांच वर्षीय प्रशिक्षण की तरह ही होगा।

2. प्रदेश में नौकरी के लिए व्यवस्था इतनी अधिक खराब है कि एक भर्ती कई सालो तक लटकी रहती हैं। इससे प्रदेश के युवा पहले ही तनाव में रहते हैं। उत्तर प्रदेश में नौकरी करना लगभग असंभव है। ऐसे में दो-तीन साल में भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी यदि युवाओं को नौकरी नहीं मिलती हैं तो ये निश्चित तौर पर गलत है। चलिए थोड़ा डिटेल में समझते हैं-

  माना एक युवक 17-18 साल की उम्र में अपनी इंटरमीडिएट पूरी करता है। इसके बाद तीन से चार वर्ष की स्नातक यानी युवक 22-23 साल का। 1-2 साल किसी भर्ती की तैयारी के लिए भी चाहिए। 24-25 साल का युवा हो चुका है। अब प्रदेश की भर्ती प्रक्रिया या नौकरी व्यवस्था बिल्कुल बेकार, अर्थात् 2-3 साल भर्ती निकलने का इंतज़ार। जब भर्ती निकलेगी युवक 27-28 साल का हो चुका होगा। 

अब चूंकि ये उत्तर प्रदेश है इसलिए भर्ती प्रक्रिया के पूरा होने में 2-4 साल लगने पहले ही तय होते है। यानि 32 युवा को प्रदेश में संविदा के तौर पर नियुक्त किया जाएगा। यानि जब तक वो नौकरी पर जाएगा वो 37+ वर्ष का हो चुका होगा। अब इस उम्र में उसकी शादी योगीजी कराएंगे।

कुल मिलाकर ये फैसला सही होता यदि प्रदेश में नौकरी व्यवस्था सही होती, सही समय पर भर्ती प्रक्रिया पूरी होती। लेकिन उत्तर प्रदेश में ये नियम बिल्कुल गलत है। मै स्वयं सरकार के इस फैसले का विरोध करता हूं।